Thursday, 11 June 2009

उलझन!

उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं,
दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए
उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं,
दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।

चले थे कभी किसी मंजिल की तलाश में,

न कोई साया हमसफ़र कोई साथ में..
राहें अंजानी पर आऱजू वही थी,
के दूर हो जाए ज़िन्दगी में जो कमी थी..

कोई सहारा कोई साथ कही मिल जाए....


उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं,

दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।

फिर एक ज़र्रे की आहट ने उम्मीद सी जगाई,

मुड के जो देखा तो वो थी मेरी परछाई..
वो कहने लगी कर भरोसा तू मुझपे,
दिन-रात कोई आंच न आने दूँगी मैं तुझपे..

उस नासमझ को कोई कैसे समझाए....


उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं.

दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।

एक लहर ने साथ देने की हामी भरी थी,
और खुशी से ठंडी हवा भी चली थी..
तेज़ धुप ने तब अपनी बाहें फैलाई,
सूख गई लहर न हवा टिक पाई..

धुप के सहारे कितनी दूर तक जाए....


उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं,

दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।

अकेली थी रूह पर दिल नही हारा,
पानी थी मंजिल दिया चांदनी ने सहारा..
खुशी से मेरी आँखें मुस्कुराई,
कुछ पल की दूरी पे मंजिल नज़र आई..

तब रोक लिया किसीने आंसू बहाए....


उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं,

दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।

मंजिल के इतने करीब आके,

दिल उदास हुआ एक उलझन को पाके..
एक तरफ़ दिल तो एक तरफ़ धड़कन थी,
चुनना था किसी एक को अगर पानी वो मंजिल थी..

दिल को धड़कन से अलग कोई कैसे कर पाए....


उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुल्झाएं,

दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।
उल्झने ज़िन्दगी की कैसे सुलझाएं,
दर्द इस दिल का कोई समझ न पाए।

No comments:

Post a Comment